
दिल्ली : दिल्ली हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा के सरकारी आवास में 20 मार्च 2025 को आग लगने की घटना के बाद एक बड़ा खुलासा हुआ। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आग बुझाने के दौरान दमकल कर्मियों को उनके घर के एक कमरे में भारी मात्रा में नकदी मिली, जिसकी अनुमानित कीमत 15 करोड़ रुपये बताई जा रही है। इस घटना ने न केवल न्यायिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया, बल्कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को भी त्वरित कार्रवाई के लिए मजबूर कर दिया।
घटना का विवरण
रिपोर्ट्स के मुताबिक जिस समय आग लगी जस्टिस वर्मा दिल्ली में मौजूद नहीं थे। उनके परिवार के सदस्यों ने फायर ब्रिगेड और स्थानीय पुलिस को सूचना दी। दमकल कर्मियों ने आग पर काबू पाने के बाद जब नुकसान का जायजा लिया तो एक कमरे में बड़ी मात्रा में नकदी बरामद हुई। यह खबर तेजी से फैली और स्थानीय पुलिस ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित किया, जिसके बाद यह जानकारी सरकार के उच्च अधिकारियों और अंततः भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना तक पहुंची।
खबर मे क्या क्या

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की प्रतिक्रिया
मामले की गंभीरता को देखते हुए CJI संजीव खन्ना ने तुरंत सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की आपात बैठक बुलाई। बैठक में सर्वसम्मति से जस्टिस यशवंत वर्मा का तबादला उनके मूल हाई कोर्ट, इलाहाबाद हाई कोर्ट, करने का फैसला लिया गया। हालांकि, यह तबादला कई लोगों के लिए सजा के बजाय एक हल्का कदम माना जा रहा है। कुछ जजों और कानूनी विशेषज्ञों ने इस मामले में जस्टिस वर्मा से इस्तीफे की मांग की है, साथ ही सुप्रीम कोर्ट की 1999 की इन-हाउस जांच प्रक्रिया के तहत गहन जांच की मांग भी उठाई है।
इन-हाउस जांच की प्रक्रिया
1999 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित इन-हाउस प्रक्रिया के तहत यदि किसी जज पर भ्रष्टाचार या अनुचित आचरण का आरोप लगता है तो CJI उस जज से जवाब मांगते हैं। यदि जवाब संतोषजनक नहीं होता है तो एक जांच समिति का गठन किया जा सकता है, जिसमें एक सुप्रीम कोर्ट जज और दो हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शामिल होते हैं। इस मामले में अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसी कोई जांच शुरू की जाएगी या नहीं।
न्यायपालिका में हलचल
इस घटना ने न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। कई जजों और वकीलों ने इसे न्यायिक जवाबदेही का मुद्दा बताते हुए सख्त कार्रवाई की मांग की है। इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी जस्टिस वर्मा के तबादले पर आपत्ति जताई है और सवाल उठाया कि क्या उनका कोर्ट “कूड़ादान” है, जहां ऐसे मामलों को भेजा जाता है। वहीं कुछ विपक्षी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस मामले को संसद में उठाने की बात कही है।
बाद में उठे सवाल और सुप्रीम कोर्ट का बयान
21 मार्च 2025 की शाम को एक नया मोड़ तब आया जब सुप्रीम कोर्ट ने एक बयान जारी कर कहा कि जस्टिस वर्मा के घर से 15 करोड़ रुपये मिलने की खबरें “गलत” और “अफवाह” हैं। इस बयान ने मामले को और रहस्यमयी बना दिया, क्योंकि इससे पहले कई विश्वसनीय मीडिया हाउस ने इसकी पुष्टि की थी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह की खबरों से न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंच रहा है। हालांकि इस बयान के बाद भी लोगों के मन में संदेह बना हुआ है क्योंकि कोई स्पष्ट सबूत या खंडन पेश नहीं किया गया।
जस्टिस यशवंत वर्मा का बैकग्राउंड
जस्टिस यशवंत वर्मा ने 2014 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में जज के रूप में कार्य शुरू किया था। 2021 में उनका तबादला दिल्ली हाई कोर्ट में हुआ जहां वह वरिष्ठता क्रम में तीसरे नंबर पर थे। इस घटना से पहले उनके करियर में कोई बड़ा विवाद सामने नहीं आया था।
जनता और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया और समाचार चैनलों पर इस घटना को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ लोगों ने इसे न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का सबूत बताया तो कुछ ने इसे महज एक अफवाह करार दिया। वकील प्रशांत भूषण जैसे लोगों ने इस मामले में पारदर्शी जांच की मांग की है, जबकि अन्य का मानना है कि बिना ठोस सबूतों के किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहिए।
निष्कर्ष
फिलहाल यह मामला अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। सुप्रीम कोर्ट का खंडन और कॉलेजियम का तबादला फैसला इस घटना को और जटिल बना रहा है। यह देखना बाकी है कि क्या इस मामले में कोई औपचारिक जांच होगी या यह सिर्फ चर्चाओं तक सीमित रह जाएगा। यह घटना निश्चित रूप से न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही के सवालों को फिर से सामने लाई है।