वक्फ संशोधन कानून 2025: मुस्लिम समुदाय में असंतोष, भाजपा पर विपक्ष का हमला

कानून पारित, लेकिन विवाद बरकरार
बरेली : वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 हाल ही में लोकसभा और राज्यसभा में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के संख्याबल के दम पर पारित हो गया। यह विधेयक वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन और प्रशासन में बदलाव लाने का दावा करता है, लेकिन इसके प्रावधानों ने देश भर में व्यापक विवाद को जन्म दिया है।
खास तौर पर मुस्लिम समुदाय के बीच इस कानून को लेकर गहरा असंतोष देखा जा रहा है। समाजवादी पार्टी (सपा) के बरेली महानगर अध्यक्ष शमीम खाँ सुल्तानी ने इस कानून की कड़ी आलोचना करते हुए इसे मुस्लिम समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला करार दिया है। दूसरी ओर, भाजपा इसे पारदर्शिता और बेहतर प्रबंधन का कदम बता रही है। इस खबर में हम दोनों पक्षों के दावों और प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण करेंगे।
खबर मे क्या क्या
शमीम खाँ सुल्तानी का तीखा बयान
शमीम खाँ सुल्तानी ने वक्फ संशोधन कानून को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि यह विधेयक वक्फ बोर्ड की स्वायत्तता को पूरी तरह खत्म कर देता है। उनके मुताबिक, इस कानून के जरिए सरकारी हस्तक्षेप को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो मुस्लिम समुदाय के लिए स्वीकार्य नहीं है। सुल्तानी ने विशेष रूप से इस प्रावधान पर आपत्ति जताई कि वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल किया जा सकता है। उन्होंने कहा, “यह मुस्लिम समुदाय की धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन में बाहरी दखल को बढ़ावा देगा, जो हमारे अधिकारों का सीधा हनन है।” उनका मानना है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत दी गई धार्मिक स्वतंत्रता को कमजोर करता है।
मुस्लिम समुदाय में असंतोष की लहर
सुल्तानी ने दावा किया कि देश के 98 प्रतिशत मुसलमान इस कानून से नाखुश हैं। उनके अनुसार, यह विधेयक न केवल वक्फ संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाता है, बल्कि मुस्लिम समुदाय की धार्मिक पहचान और स्वायत्तता को भी खतरे में डालता है। उन्होंने कहा कि वक्फ बोर्ड, जो ऐतिहासिक रूप से मुस्लिम समुदाय की धार्मिक और परोपकारी गतिविधियों के लिए बनाया गया था, अब सरकारी मशीनरी के अधीन हो जाएगा। सुल्तानी ने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा का यह कदम मुस्लिम विरोधी एजेंडे का हिस्सा है, जिसे समुदाय भली-भांति समझता है।
भाजपा का दावा: पारदर्शिता और प्रबंधन में सुधार
दूसरी ओर, भाजपा सरकार इस कानून को वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने का जरिया बता रही है। केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू और गृह मंत्री अमित शाह ने बार-बार कहा है कि यह विधेयक मुस्लिम समुदाय की धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप नहीं करता। शाह ने लोकसभा में बहस के दौरान स्पष्ट किया, “वक्फ मुस्लिम भाइयों का ट्रस्ट है, और इसमें सरकार कोई दखल नहीं देना चाहती। मुतवल्ली और वाकिफ भी उनके ही होंगे।” भाजपा का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग को रोकना और गरीब मुस्लिमों, खासकर पसमांदा समुदाय, को इसका लाभ पहुंचाना है।
विपक्ष का जवाबी हमला: वादों का सच
शमीम खाँ सुल्तानी ने भाजपा के दावों को खारिज करते हुए कहा कि यह सब “मुंगेरी लाल के हसीन सपने” हैं। उन्होंने तीन तलाक कानून का उदाहरण देते हुए कहा कि उस समय भी भाजपा ने बड़े-बड़े वादे किए थे, लेकिन जमीनी हकीकत में मुस्लिम महिलाओं और गरीबों को कोई खास फायदा नहीं मिला। सुल्तानी ने पूछा, “अगर भाजपा वाकई मुस्लिम कल्याण चाहती है, तो तीन तलाक कानून के बाद गरीब मुस्लिम परिवारों की स्थिति में क्या सुधार हुआ ? इसको बताए ” उनका कहना है कि वक्फ संशोधन कानून भी ऐसा ही एक दिखावा है, जिसके पीछे असल मंशा धार्मिक स्वतंत्रता को कमजोर करना है।
एक विभाजनकारी मुद्दा
वक्फ संशोधन कानून 2025 ने एक बार फिर भाजपा और विपक्ष के बीच वैचारिक टकराव को उजागर कर दिया है। जहां सरकार इसे प्रशासनिक सुधार का कदम बता रही है, वहीं विपक्ष और मुस्लिम समुदाय इसे धार्मिक स्वायत्तता पर हमला मानते हैं। शमीम खाँ सुल्तानी जैसे नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया से साफ है कि यह कानून आने वाले दिनों में राजनीतिक और सामाजिक बहस का बड़ा मुद्दा बना रहेगा। क्या यह कानून वाकई पारदर्शिता लाएगा या मुस्लिम समुदाय के अधिकारों को कमजोर करेगा, यह समय ही बताएगा। फिलहाल, देश के मुसलमानों के बीच इस कानून को लेकर गहरी नाराजगी साफ दिखाई दे रही है।