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वक्फ़ संपत्तियों की सुरक्षा पर अहम बैठक: क़ाज़ी-ए-हिंदुस्तान की अगुवाई में संवैधानिक अधिकारों की बात

बरेली , 05 अप्रैल 2025 : बरेली, जो सूफी परंपरा का विश्व प्रसिद्ध मरकज़ (केंद्र) है, वहां बीती  देर रात एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। यह बैठक क़ाज़ी-ए-हिंदुस्तान मुफ्ती मुहम्मद असजद रज़ा खां क़ादरी की सदारत (अध्यक्षता) में हुई, जिसमें वक्फ जायदाद (संपत्तियों) की हिफाज़त (सुरक्षा) और इसके संवैधानिक हकूक (अधिकारों) पर गहन चर्चा हुई। इस बैठक में उलेमा-ए-किराम (धार्मिक विद्वान), वकीलों और जमात रज़ा-ए-मुस्तफा की कोर कमेटी के अहम ओहदेदारों (पदाधिकारियों) ने शिरकत (भागीदारी) की। बैठक का मकसद (उद्देश्य) वक्फ संपत्तियों के तहफ्फुज़ (संरक्षण), इसके कानूनी पहलुओं और हाल ही में संसद में पास हुए वक्फ (संशोधन) विधेयक 2025 पर विचार-विमर्श करना था।

क़ाज़ी-ए-हिंदुस्तान का बयान: वक्फ संपत्ति हमारी अमानत

क़ाज़ी-ए-हिंदुस्तान मुफ्ती मुहम्मद असजद रज़ा खां क़ादरी ने बैठक में फरमाया (कहा) कि हमारे बुजुर्गों ने अपनी क़ीमती जायदादें अल्लाह की राह में वक्फ की थीं। उनका मकसद था कि ये जायदादें हमेशा दीनी (धार्मिक), तालीमी (शैक्षिक) और फलाही (कल्याणकारी) कामों के लिए इस्तेमाल हों। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय संविधान हमें वक्फ संपत्तियों की हिफाज़त और सही इस्तेमाल का पूरा हक देता है। यह बिल संशोधन के नाम पर एक साज़िश है। अगर कानून सबके लिए बराबरी का नहीं होगा, तो वह जुल्म (अन्याय) बन जाता है।

उन्होंने आगे कहा कि वक्फ संपत्ति अल्लाह के नाम पर निहित एक दीनी जायदाद है, जो इस्लामी रिवायत (परंपरा) में सादका-ए-जारिया (निरंतर दान), खैरात (दान) और मुस्लिम अवाम (समुदाय) की भलाई का प्रतीक है। इस बिल को संविधान और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के खिलाफ एक गैर-कानूनी कोशिश करार दिया।

संविधान के खिलाफ बिल: प्रमुख नुक्ते

1.अनुच्छेद 26 का हनन: यह बिल संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत मुसलमानों को मिले दीनी मामलों के इंतेज़ाम (प्रबंधन) के हक का उल्लंघन करता है।

2.अनुच्छेद 25 और 26 की आज़ादी: यह बिल धार्मिक आज़ादी और दीनी इदारों (संस्थाओं) के इंतेज़ाम के हकूक के खिलाफ है।

3.अनुच्छेद 246(3) का उल्लंघन: बिल राज्यों के खास कानूनी दायरे में दखल देता है, जो इसे गैर-संवैधानिक बनाता है।

4.खंड 3(ix) की आलोचना: बिल में अगाखानी और बोहरा वक्फ जैसे उप-समूहों का ज़िक्र संविधान से बाहर है और इससे मुस्लिम अवाम में तकसीम (विभाजन) का खतरा बढ़ता है।

5.सिविल कोर्ट का हक: जायदाद के मालिकाना हक का फैसला सिर्फ सिविल कोर्ट कर सकता है, न कि हुकूमत (सरकार) के अफसर, जैसा बिल में मंसूबा (प्रस्तावित) है। यह इंसाफ के उसूलों (सिद्धांतों) के खिलाफ है।

6.अनुच्छेद 14 का उल्लंघन: जहाँ हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध एंडोमेंट को तहफ्फुज़ मिला है, वहीं मुस्लिम वक्फ को बराबरी का हक नहीं दिया गया। इस्तेमाल के आधार पर वक्फ को खत्म करना और गैर-मुस्लिमों को इसका इंतेज़ाम सौंपना नाइंसाफी को ज़ाहिर करता है।

मुंबई के एंटीलिया मामले का ज़िक्र

बैठक में मुंबई के मशहूर एंटीलिया मामले का हवाला दिया गया। यह जायदाद पहले खोजा समुदाय की वक्फ संपत्ति थी, जो अब सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। सवाल उठाया गया कि क्या इस बिल के ज़रिए हुकूमत विवादित वक्फ जायदादों पर असर डालने की कोशिश कर रही है?

उलेमा और वकीलों की सख्त मुखालिफत

उलेमा-ए-किराम और वकीलों ने बिल की सख्त लफ्ज़ों में मजम्मत (निंदा) की। उन्होंने कहा कि जो कुछ शरीयत के खिलाफ हो, उसे मुसलमान कभी कबूल नहीं करेंगे। यह बिल न सिर्फ संविधान बल्कि इस्लामी उसूलों के भी खिलाफ है।

सलमान मिया का बयान: संविधान हमारा हक देता है

जमात रज़ा-ए-मुस्तफा के कौमी नायब सदर (राष्ट्रीय उपाध्यक्ष) सलमान हसन खान (सलमान मिया) ने कहा कि हम हिंदुस्तान के शहरी (नागरिक) हैं। संविधान हमें अपने बुनियादी हकूक के तहत वक्फ जायदादों की हिफाज़त और तहफ्फुज़ के लिए आवाज़ बुलंद करने की आज़ादी देता है। अनुच्छेद 25 और 26 हमें दीनी आज़ादी और इदारों के इंतेज़ाम का हक देते हैं। अनुच्छेद 14 बराबरी और अनुच्छेद 21 इज़्ज़त से जीने का हक मुहैया करता है। वक्फ जायदादें हमारी दीनी और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं, और इन पर दस्तदरज़ी (अतिक्रमण) या गलत इस्तेमाल संविधान की रूह (भावना) के खिलाफ है।

आगे की रणनीति: जागरूकता और कानूनी कदम

बैठक में फैसला लिया गया कि इस मसले को अवाम (जनता) के सामने लाने के लिए मुल्क भर में तहरीक (अभियान) चलाया जाएगा। ज़रूरत पड़ने पर कानूनी रास्ता भी अपनाया जाएगा। सलमान मिया ने बताया कि जल्द ही क़ाज़ी-ए-हिंदुस्तान के हुक्म से मुल्क के बड़े उलेमा-ए-किराम की बैठक बुलाई जाएगी, जिसमें आगे की सूरत-ए-हाल (रणनीति) तय होगी।

वक्फ की हिफाज़त हमारा फर्ज़

यह बैठक वक्फ संपत्तियों की हिफाज़त को लेकर एक अहम कदम साबित हुई। क़ाज़ी-ए-हिंदुस्तान और उलेमा ने साफ कर दिया कि वक्फ जायदादों का तहफ्फुज़ न सिर्फ हमारा दीनी फर्ज़ है, बल्कि संविधान भी हमें यह हक देता है। अब देखना यह है कि इस मसले पर हुकूमत का अगला कदम क्या होगा।

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