खानकाहे नियाज़िया में हुआ सामूहिक रोज़ा इफ्तार,हज़रत अली (अ.स.) की शहादत की याद में एक रूहानी माहौल
रिपोर्ट - सैयद मारूफ अली

बरेली: खानकाह ए आलिया नियाज़िया में 21 रमज़ानुल मुबारक के पवित्र दिन हज़रत मौला अली (अ.स.) की शहादत की याद में एक भव्य और रूहानी आयोजन का इनेकाद हुआ। इस मौके पर फातेहा ख्वानी और सामूहिक रोज़ा इफ्तार का शानदार इंतेज़ाम किया गया था।
हजरत अली इस्लामी तारीख के एक अज़ीम शख्सियत और मुश्किल कुशा के तौर पर मशहूर हैं
खानकाह के सज्जादा नशीन और प्रबंधक हज़रत जुनैदी मियां नियाज़ी की सरपरस्ती में यह प्रोग्राम मुनअकिद हुआ, जिसमें तमाम साहिबजादगान और अकीदतमंदों की कसीर तादाद ने शिरकत की। यह आयोजन हज़रत अली (अ.स.) की याद को ताज़ा करने और उनकी शान में खिराज-ए-अकीदत पेश करने के लिए खास तौर पर मुनज़्ज़म किया गया था, जो इस्लामी तारीख के एक अज़ीम शख्सियत और मुश्किल कुशा के तौर पर मशहूर हैं।
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हुआ लंगर जो है सूफी रिवायतों का अहम हिस्सा
खानकाह में इस मौके पर लंगर का भी इंतेज़ाम किया गया था, जो सूफी रिवायत का एक अहम हिस्सा है। फातेहा ख्वानी और लंगर के ज़रिए अवाम के दरमियान वाहिदगी, मुहब्बत और रूहानी बेदारी को फ़रोग देने की कोशिश की गई। सूफी परंपरा में इस तरह के आयोजन न सिर्फ इबादत का ज़रिया हैं, बल्कि समाजी एकजेहती और भाईचारे को मजबूत करने का भी सबब बनते हैं।
हजरत अली (अ.स.) की शिक्षाओं पर अमल करने की अहद
खानकाह ए नियाज़िया, जो बरेली में अपनी तारीखी और मज़हबी अहमियत की वजह से मशहूर है, इस मौके पर एक रूहानी मरकज़ बन गई थी, जहां लोग अपने दिलों को मुनव्वर करने और हज़रत अली (अ.स.) की शिक्षाओं पर अमल करने का अहद लेते नज़र आए।
हजरत अली (अ.स.) इंसाफ, सच्चाई और हिम्मत की मिसाल
हज़रत अली (अ.स.), जो चौथे खलीफा और पैगंबर-ए-इस्लाम हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) के दामाद और चचाज़ाद भाई थे, उनकी शहादत का दिन मुस्लिम उम्मत के लिए एक गम्भीर और फ़िक्र अंगेज़ मौका होता है। यह दिन 21 रमज़ान को मस्जिद-ए-कूफ़ा में उस वक्त हुआ जब वह सुबह की नमाज़ के लिए तशरीफ़ ले जा रहे थे। उनकी शहादत न सिर्फ एक तारीखी वाकिया है, बल्कि एक ऐसा सबक भी है जो इंसाफ, सच्चाई और हिम्मत की मिसाल कायम करता है। इस दिन को मुसलमान खास तौर पर रोज़े, दुआओं और फातेहा ख्वानी के साथ याद करते हैं ताकि उनकी ज़िंदगी से इल्म-ओ-अमल की रौशनी हासिल कर सकें।
हज़रत अली (अ.स.) की शान में पेश की गईं नात-ओ-मनकबत
खानकाह ए नियाज़िया में मुनअकिद इस जलसे में मौजूद अकीदतमंदों ने हज़रत अली (अ.स.) की शान में नात-ओ-मनकबत पेश कीं और उनकी जिंदगी के वाकियात पर गहरे तौर से गौर किया। जुनैदी मियां नियाज़ी ने अपने खिताब में फरमाया कि हज़रत अली (अ.स.) की शहादत हमें यह पैगाम देती है कि हक और इंसाफ के रास्ते पर चलना ही असल कामयाबी है। उन्होंने यह भी कहा कि सूफी सिलसिले में हज़रत अली (अ.स.) की शख्सियत एक मिसाली और रूहानी रहनुमा की हैसियत रखती है, जिनसे हर शख्स को सीख हासिल करनी चाहिए।
खानकाहे नियाज़िया न सिर्फ इबादत की जगह है, बल्कि समाजी इत्तिहाद का भी मरकज़ है
इस आयोजन में शामिल होने वाले लोगों ने लंगर में शिरकत की और एक साथ बैठकर रोज़ा इफ्तार किया, जो इस बात का सबूत था कि खानकाह न सिर्फ इबादत की जगह है, बल्कि समाजी इत्तिहाद का भी मरकज़ है। बच्चे, जवान और बुजुर्ग सभी इस रूहानी माहौल का हिस्सा बने और हज़रत अली (अ.स.) की याद में अपनी अकीदत का इज़हार किया। रोज़ा इफ्तार के बाद खास दुआओं का भी अहतिमाम हुआ, जिसमें मुल्क की तरक्की, अमन और उम्मत की फलाह-ओ-बहबूद के लिए हाथ उठाए गए।
हज़रत अली (अ.स.) एक लाजवाब मुजाहिद और रहनुमा
हज़रत अली (अ.स.) की शिक्षाएं, जो इल्म, हिकमत और इंसाफ पर मबनी हैं, आज भी मुसलमानों के लिए एक मशाल-ए-राह की तरह हैं। उनकी बहादुरी और जंग-ए-खैबर, जंग-ए-उहद जैसे मौकों पर उनकी शानदार कारनामों ने उन्हें एक लाजवाब मुजाहिद और रहनुमा के तौर पर मशहूर किया। खानकाह ए नियाज़िया में इस मौके पर उनकी इन खूबियों को याद किया गया और लोगों ने उनके बताए हुए रास्ते पर चलने का इरादा किया।यह आयोजन न सिर्फ एक मज़हबी जलसा था, बल्कि एक ऐसा मंच भी था जहां लोगों ने अपने दिलों को रूहानी ताकत से भरने की कोशिश की।
ये प्रोग्राम एक यादगार और रूह को सुकून देने का तजुर्बा रहा
खानकाह ए नियाज़िया ने इस मौके पर अपनी तारीखी अहमियत को एक बार फिर साबित किया और यह दिखाया कि सूफी रिवायतें आज भी ज़िंदा हैं और समाज को जोड़ने में अहम किरदार अदा कर रही हैं। हज़रत अली (अ.स.) की शहादत की याद में मुनअकिद यह प्रोग्राम हर शिरकत करने वाले के लिए एक यादगार और रूह को सुकून देने वाला तजुर्बा रहा।