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“संत गाडगे के अनुयायियों का आक्रोश: सम्मान और सुरक्षा की मांग तेज”

रिपोर्टर - सैयद मारूफ अली

बरेली, 27 मार्च 2025: उत्तर प्रदेश की तीसरी सबसे बड़ी अनुसूचित जाति, धोबी/रजक समाज, इन दिनों हिंसा, शोषण और अत्याचार की घटनाओं से जूझ रहा है। इस संदर्भ में गाडगे यूथ ब्रिगेड ने बरेली के जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक ज्ञापन सौंपा है, जिसमें समाज के साथ हो रहे भेदभाव और प्रशासन की असंवेदनशीलता पर गहरी चिंता जताई गई है। ज्ञापन में चार प्रमुख मुद्दों को उठाया गया है, जिनमें संत गाडगे जयंती पर सरकारी अवकाश, बदायूं में प्रतिमा अनावरण पर रोक, डिप्टी जेलर मीना कनौजिया के साथ दुर्व्यवहार, और कौशांबी में एक परिवार की नृशंस हत्या शामिल हैं। समाज ने इन मामलों में त्वरित कार्रवाई और न्याय की गुहार लगाई है।

धोबी समाज: शांतिप्रिय और प्रगतिशील, फिर भी उपेक्षित

धोबी समाज, जो श्रमजीवी और उच्च साक्षरता वाला समुदाय है, अपने सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक विकास के लिए प्रयासरत है। यह समाज देश की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है, परंतु हाल के वर्षों में इसके खिलाफ अत्याचार और हिंसा की घटनाओं में चिंताजनक वृद्धि हुई है। ज्ञापन में कहा गया है कि असामाजिक और रूढ़िवादी तत्वों द्वारा समाज को निशाना बनाया जा रहा है, और सरकार व प्रशासन की उदासीनता ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।

"संत गाडगे के अनुयायियों का आक्रोश: सम्मान और सुरक्षा की मांग तेज"
कलेक्ट्रेट पर ज्ञापन लेकर पहुंचे गाडगे यूथ ब्रिगेड के कार्यकर्ता
संत गाडगे जयंती पर अवकाश की मांग

संत गाडगे महाराज, धोबी समाज के महान संत, जिनकी शिक्षाएं समाज को आत्मसम्मान और स्वाभिमान की प्रेरणा देती हैं, उनकी जयंती प्रत्येक वर्ष 23 फरवरी को धूमधाम से मनाई जाती है। इस अवसर पर नौकरीपेशा लोग और छात्र-छात्राएं बड़े पैमाने पर भाग लेते हैं, लेकिन सरकारी अवकाश न होने के कारण कई लोग शामिल नहीं हो पाते। समाज लंबे समय से इस दिन अवकाश की मांग करता आ रहा है। इस वर्ष मुख्यमंत्री ने संत रविदास जयंती पर अवकाश की घोषणा की, परंतु 149वीं संत गाडगे जयंती में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने के बावजूद इस मांग पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। समाज ने इसे भेदभाव का प्रतीक बताया और अवकाश घोषित करने की अपील की।

बदायूं में प्रतिमा अनावरण पर रोक: समाज में आक्रोश

बदायूं जिले में नगर पालिका परिषद ने धोबी समाज की मांग पर संत गाडगे महाराज की प्रतिमा स्थापना का प्रस्ताव पारित किया था। कमिश्नर से स्वीकृति मिलने के बाद 23 फरवरी को मीरा की चौकी पर अनावरण की तैयारी पूरी हो चुकी थी। लेकिन ऐन मौके पर प्रशासन ने बिना ठोस कारण बताए कार्यक्रम पर रोक लगा दी। इससे बदायूं सहित पूरे प्रदेश और देशभर के धोबी समाज में रोष फैल गया। ज्ञापन में इस मामले की मजिस्ट्रियल जांच कर दोषी अधिकारियों को दंडित करने और प्रतिमा की सम्मानजनक स्थापना की मांग की गई है।

डिप्टी जेलर मीना कनौजिया के साथ जातिगत दुर्व्यवहार

धोबी समाज की डिप्टी जेलर मीना कनौजिया, जो पहले वाराणसी जेल में तैनात थीं और अब नैनी (प्रयागराज) में संबद्ध हैं, के साथ जेलर उमेश सिंह द्वारा जातिगत टिप्पणी और दुर्व्यवहार का मामला सामने आया है। इस घटना ने उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाई और वे आत्महत्या जैसे मानसिक संकट से गुजर रही हैं। शिकायत के बावजूद सरकार और जेल विभाग ने कोई कार्रवाई नहीं की। उल्टे, जेलर ने उन्हें धमकी दी है। समाज ने जेलर के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की है, ताकि इस तरह के भेदभाव को रोका जा सके।

कौशांबी में नृशंस हत्या: मुआवजे और नौकरी की मांग

कौशांबी जिले के चायल थाना क्षेत्र के काजू गांव में संगीता (45) और उनके बेटे सर्वजीत (22) की कुल्हाड़ी और गंडासे से बर्बर हत्या कर दी गई। यह परिवार आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर है, और इस घटना ने इसे पूरी तरह तोड़ दिया। समाज ने इस मामले को फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाने, हत्यारों को फांसी की सजा दिलाने, परिवार को एक करोड़ रुपये का मुआवजा और छोटे बेटे को सरकारी नौकरी देने की मांग की है, ताकि यह परिवार फिर से मुख्यधारा में लौट सके।

समाज का आह्वान: न्याय और सम्मान की पुकार

ज्ञापन में कहा गया है कि इन घटनाओं से धोबी समाज में रोष और अशांति का माहौल है। समाज ने मुख्यमंत्री से तत्काल हस्तक्षेप कर इन मांगों को पूरा करने की अपील की है, ताकि यह समुदाय खुद को अलग-थलग और शोषित महसूस न करे। गाडगे यूथ ब्रिगेड ने चेतावनी दी कि यदि मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो समाज को मजबूरन बड़े कदम उठाने पड़ सकते हैं।

निष्कर्ष: धोबी समाज ने इस ज्ञापन के माध्यम से अपनी पीड़ा और अपेक्षाओं को सरकार के समक्ष रखा है। अब यह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर निर्भर है कि वे इस समुदाय को न्याय और सम्मान दिलाने के लिए कितनी संवेदनशीलता और तत्परता दिखाते हैं। समाज उम्मीद कर रहा है कि उनकी मांगों पर शीघ्र विचार होगा और वे विकास की मुख्यधारा में बराबरी का हक पा सकेंगे।

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